।। विश्व मलेरिया दिवस।।
25 अप्रैल
"तू डाल डाल मैं पात पात" बीमारियों और मनुष्य की यह कशमकश आदिकाल से चलती आ रही है, पर अदम्य जीवन का प्रतीक मानव कब हार मारने वाला है। उसने सैकड़ों चुनौतियों को चाहें वे स्वास्थ्य के क्षेत्र में हों या किसी अन्य क्षेत्र में, डटकर मुकाबला कर मुसीबतों के पहाड़ों को चीर कर, भगीरथ गंगा की सलिल पावन धारा को प्रवाहित कर ही दिया है। जैसे आज कोरोना ने हमको हैरान परेशान कर रखा है, ठीक वैसे ही कभी मलेरिया ने भी हमारा नाक में दम कर रखा था।
मुझे याद है, मेरे पापाजी मलेरिया अधिकारी पद पर कार्यरत थे, कितनी ही बार जिज्ञासा वश मैं उनके साथ उनके ऑफिस पहुंच जाया करती थी। देखना चाहती थी कि कैसे ये मलेरिया योद्धा इस जानलेवा और शरीर को तोड़ देने वाली बीमारी से लड़ते हैं। वे मलेरिया वर्करों की जुझारू टीम के सास गांव गांव जाते थे। वर्कर डीडीटी पाउडर का घोल बनाकर घर-घर गली-गली में लोगों की नानुकुर के बावजूद स्प्रे किया करते थे। सुपरवाइजर द्वार द्वार जाकर लोगों के मलेरिया के टेस्ट के स्लाइड बनाकर प्रयोगशाला में भेजा करते थे, और संक्रमित रोगियों को घर-घर जाकर कुनैन की गोलियां बांटी जाती थी।
आज कोरोना का परिदृश्य देखती हूँ, बरबस ही मलेरिया उन्मूलन का वह कार्यक्रम याद आ जाता है। जब हमने मलेरिया पर जीत पा ली है, जिसने विश्वव्यापी मानवता को पीड़ित कर रखा था, तो विश्वास मानिए कोरोना से भी हम हार नहीं मानने वाले। हमारी अदम्य जिंजीविषा रास्ते निकाल रही है और आगे भी निकालती रहेगी।
आज भी विश्व के कई देश मलेरिया से लड़ रहे हैं, पर भारत ने मलेरिया पर काफी हद तक जीत हासिल कर ली है। जब भारत की कुल जनसंख्या 33 करोड़ थी उस समय लगभग 800000 व्यक्ति हर साल मलेरिया की भेंट चढ़ जाते थे और आज जब भारत की जनसंख्या सवा अरब है, तो मात्र दो- ढाई हजार मौत हर साल मलेरिया के नाम दर्ज होती हैं तथा भारत सरकार ने 2030 तक भारत देश को मलेरिया रहित देश के रूप में स्थापित करने का संकल्प रखा है। इस आशातीत सफलता के पीछे जो कारण रहे, वे हैं-
1.प्रभावी उपकरणों का प्रयोग
2.सरकार का बेहतर नेतृत्व
3.सामुदायिक भागीदारी
4.विकेन्द्रीकृत क्रियान्वयन
5.कुशल तकनीकी-प्रबंधक कामगार
6.भागीदार संस्थाओं द्वारा सही तकनीकी सहयोग
7.पर्याप्त कोष मिलना।
आज मलेरिया दिवस पर मैं आपको मलेरिया से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी देना चाहूंगी-
1.मलेरिया या दुर्वात एक मच्छर वाहक-जनित संक्रामक रोग है जो प्रोटोज़ोआ परजीवी द्वारा फैलता है।
2.इसे 'दलदली बुखार' अंग्रेजी में marsh fever(मार्श फ़ीवर)भी कहा जाता था, क्योंकि यह दलदली क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलता था।
3.आज हम सब जानते हैं कि मलेरिया मादा एनोफिलीज़ मच्छर के काटने से होता है। पर 1898 से पहले किसी को भनक भी नही थी कि यह मलेरिया आखिर फैलता कैसे है?
4.1898 पहली बार यह दावा किया गया कि मच्छर ही मलेरिया रोग को एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक फैलाते हैं, किंतु इसे प्रमाणित करने का कार्य ब्रिटेन के *सर रोनाल्ड रॉस ने भारत के सिकंदराबाद शहर में 1898 में किया था।
5.इस कार्य हेतु उन्हें *1902 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार* मिला। 6.1953 में भारत में मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम की शुरुआत की गई, जिसके तहत युद्ध स्तर पर डीडीटी का छिड़काव, टेस्टिंग और कुनैन का वितरण किया गया था।
आज विश्व मलेरिया दिवस पर मैं मलेरिया विभाग के सभी वर्कर, सुपरवाइजर और अधिकारियों से निवेदन करना चाहूंगी कि जिस समर्पण के साथ आपने मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम में योगदान दिया, वैसे ही आज आप कोरोना के उन्मूलन के लिए भी जुट जाएं, हम सब साथ साथ हैं आइए, इसी शिद्दत और संकल्प के साथ कोरोना के विरुद्ध लड़ाई जारी रखें।
।।मधुवंदन।।
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