चाँद जैसी होती है माँ
चाँद जैसी होती है माँ
दाग अपने पास रख
चाँदनी फैलाती है माँ
आग कहाँ उसके अंदर
अमृत बरसाती है माँ
बाहें दूर तक पसार आँचल में छिपाती है माँ
बच्चों में अपनी परछाई
हर पल बसाती है माँ
बेटा हो या बेटी
दोनों की होती है माँ
उस पर पड़ी
हर मैली नज़र को
झट उतारती है माँ
ऊँची प्राचीरें देकर
बड़े बड़े दरवाजे खोलती है माँ
वज्र से संकल्प सा
मूक जबाव देती है माँ
कभी मोम कभी फौलाद सी
तासीरों को पालती है माँ
बदली सी पिघल
सुख का सागर बन जाती है माँ
जब जीत कर घर आएँ
दुआओं से राजतिलक करती है माँ
सांझ की देहरी उतरती उषा सुंदरी
तब सिंदूर भाल चढ़ाती है माँ
रात घिर आती जब आसमान में
भोर सी उग आती हैं माँ
वक्त के वार को सहती
हर दिन छीजती रहती है माँ
अंधियारी अमावस से भी
कब हार मानती है माँ
बार बार उजिआरी पूनम
हाथ में थमा जाती है माँ
राहु ग्रसे या केतु डसे
सबसे उऋण करती है माँ
धूप बरसे या बरसे प्रलय
अगस्त्य ऋषि बन पी जाती है माँ
धरती के किसी छोर पर जाऊं
साथ साथ चलती है माँ।
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