गज़ल


 मखमली शब्दों में मकरंदी अर्थ,

गज़ल की थी बस इक यही शर्त।

बात गहराई से निकले और दूर तक चली जाए,

जहाँ लगनी चाहिए थी उसे छूती हुई सरक जाए,

कभी आग सी गर्म कभी बर्फ सी सर्द,

गज़ल की थी बस इक यही शर्त।

गुज़रा हुआ कल फिर आज तरन्नुम में चला आए,

आने वाले कल की वो मीठी मीठी दस्तक दे जाए,

कभी पीली ज़र्द कभी गुलाब सी सुर्ख,

गज़ल की थी बस इक यही शर्त।

जो कहना है बेख़ौफ बेबाक़ी से सरेआम कह जाए,

किसी कंधे पर सर रख बंधे हाथों से पाँव न दबाए,

नर्म लहज़ो से पिघल जाए सख्त पर्त,

गज़ल की थी बस इक यही शर्त।

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