नीलगगन तले ओढ़े धरा धानी चुनरिया,
खेत, वन, बागों में बसंत उतर आयो है।
अंगड़ाई ले योवन की गदराई जमुनिया,
तन मन महका मस्त मौसम इठलायो है।
झूम रही लकदक बौराय ग़ई अमरइयां,
छपक छपक हवा कलियन सहलायो है।
पतियाए गए बिरवा हुलसाए फुलवरिया,
कुम्हलायो चमन फिर से निखर आयो है।
नाचे मोर, मचाए शोर कुहूके कोयलिया,
चहुं ओर स्वर्गिक मदनोत्सव गहरायो है।
चंचू लड़ाए कलम दवात करे गलबहियां
मां सरस्वती को धवल पल्लू लहरायो है।
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