सबक जिंदगी के

वो सीढियां चढ़ तो रहा था 

पर कदमों में लड़खड़ाहट थी

मन पीछे भागता था

आंखों में घबराहट थी

न कोई दिशा थी 

न उसे दशा का भान था

न रास्ते की पैमाईश थी

न किसी नक्शे का गुमान था

उसने अपनों को साथ लिया ही नहीं

दुआओं की दरकार समझी ही नहीं

किसी की लिखी पढ़ी, देखी सुनी ही नहीं

रुककर खुद को कभी खोजा ही नहीं

भोर होते ही आत्ममुग्धता पर रीझता 

हर सांझ अपने भाग्य पर खीझता

रातों को बेबस मुट्ठियों भींचता

जैसे तैसे दिनों को खींचता

बस यूं ही चढ़ता उतरता रहा

कुढ़ता रहा लुढ़कता रहा

अपनी राह भटकता रहा

गैर कंधों पर बंदूक धरता रहा

अब उसमें न हिम्मत बची थी

न ही आगे बढ़ने की ताब थी

हाथ में मनहूसियत से लिपटी

कोरी बिल्कुल कोरी किताब थी

सीढियां तो हमको भी चढ़नी हैं,

पर कैसे, यह बात समझनी है,

उसकी जिंदगी सबक है हमें,

क्या क्या सावधानियां रखनी है।

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