गज़ल, मज़ा आता है


वो बच्चों के साथ बच्चा हो जाना बहुत मज़ा आता है।

समझदार बड़ों के साथ कहो कहाँ इतना मज़ा आता है।।

छोड़कर खर्चीले डिजिटल ढेर सारे गेम्स खेल खिलौने। 

खेलना चिमटों चम्मचों से बच्चों को खूब मज़ा आता है।।

रूस, अमेरिका, यूरोप के तमाम शाही मुल्कों के नाम।

हो जब भारत की थोड़ी सी भी बात बड़ा मज़ा आता है।।

बेतुकी गचपच कीचड़ उछालती प्रोग्रामी बहस के बाद।

बंद कमरों में मिले इन हाथों को क्यों इत्ता मज़ा आता है।।

वो भाई, वो बहिनें, वो भाभियों का कुनबा का कुनबा।

न हों एक घर में साथ साथ तो कहाँ कोई मज़ा आता है।।

होली, दीवाली का मौका हो या कोई और तीज त्योहार।

खाए न मां के हाथ पकवान तो क्या ख़ाक मज़ा आता है।।

वो शेर, वो शायरी, वो कविताओं से ग़ाफ़िल महफ़िल। 

न हो कदरदानों की गर्म दाद तो क्या तुम्हें मज़ा आता है।।

वो यार, वो दोस्त, वो प्यार मोहब्बत से तरबेज़ ज़माना। 

करके न कसकती कुछ यादें तो नहीं जरा मज़ा आता है।।

गुजरे हुए ज़माने का कोई यार मिले जब बीबी हो साथ।

हो बस आंखों आंखों में बात कहो कितना मज़ा आता है।।

वो पेड़, वो पत्ते, वो डालों पर रंगीन फूलों का खिलना।

न हो टिपटिप बरसात तो 'मधु' कहाँ इनका मज़ा आता है।।

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