कोणार्क' - जगदीश चंद्र माथुर
(एक विहंगम दृष्टि)-डॉ. मधुगुप्ता
'कोणार्क' जगदीश चन्द्र माथुर का एक प्रसिद्ध नाटक है। सुमित्रानंदन पंत के अनुसार "जगदीशचन्द्र माथुर का 'कोणार्क अत्यन्त सफल कृति है। नाट्यकला की ऐसी सर्वांगपूर्ण सृष्टि अन्यत्र देखने को नहीं मिली। विषय निर्वाचन, कथा-वस्तु, क्रम-विकास, संवाद, ध्वनि, मितव्ययिता आदि दृष्टियों से कोणार्क अद्भुत कला-कृति है, जिसमें नाटक की सीमाएँ एक रहस्य विस्तार में खो-सी गई हैं। उपक्रम में आंखों के सामने एक विस्मृत ऐतिहासिक युग का ध्वंसशेप, कल्पना में समुद्र की तरह आरपार उद्वेलित होकर साकार हो उठता है, जिसकी तरंगों के व्यया-द्रवित उत्थान-पतन में करुण, विद्रोह-भरा नाटक का कयानक मन की आंखों के सम्मुख प्रत्यक्ष हो जाता है। उपसंहार में नाटक की अमर अमिट अनुगूंज हृदय के श्रवणों में अविराम गूंजती रहती हैं। इस नाटक का तृतीय अंक अत्यन्त सशक्त तया प्रभावोशाली बन पड़ा है। कलाकार का बदला जीवन सौन्दर्य को ही चुनौती नहीं देता, अत्याचारी को भी जैसे सूर्यहीन लोक के अतल अंधकार में डाल देता है। सहनशील विशु तया विद्रोही धर्मपद में जैसे कला के प्राचीन और नवीन युग मूर्तिमान हो उठे हैं | धर्मपद में आधुनिक कलाकार का विद्रोह ही जैसे व्यक्तित्व ग्रहण कर लेता है। विशु और धर्मपद का पिता-पुत्र का नाता और तत्संबंधी करुण-कथा जैसे इतिहास के गर्जन में मानव हृदय की धड़कन में घुल-मिल कर नाटक को मामिकता प्रदान करती है। आज के राजनीतिक आर्थिक संघर्ष के जर्जर युग में कोणार्क के द्वारा कला और संस्कृति जसीसे अपनी चिरंतन उपेक्षा का विद्रोहपूर्ण संदेश मनुष्य के पास पहुंचा रही हैं।"
प्रमुख पात्र-
सूत्रधारः उपक्रम, उपसंहार और उपकथनों के वृन्दवार्तिक
विशु: उत्कल राज्य का प्रधान शिल्पी और कोणार्क का निर्माता
धर्मपद: एक प्रतिभाशाली युवक नवशिल्पी
नरसिंहदेव :उत्कल-नरेशराज
चालुक्य: उत्कल-नरेश का महामात्य
सौम्य श्री दत्त: विशु का मित्र और मन्दिर का नाट्याचार्य
राजीव :मुख्य पाषाण-कोर्तक
शैवालिक :चालुक्य का दूत
महेन्द्रवर्मन: नरसिंह देव का रहस्याधिकारी
भास्कर गजाधर, अन्य शिल्पी प्रतिहारीगण, सैनिक, पहली याचिका, दूसरी याचिका
कोणार्क का कथानक तीन अंकों में विभाजित है-
प्रथम अंक-
प्रथम अंक में महाशिल्पी विशु का मंदिर के शिखर के ठीक से नहीं जम पाने के लियए चिंतन का चित्रण किया गया है। मंदिर का निर्माण लगभग पूरा हो गया है। केवल शिखर की प्रतिष्ठा नहीं हो पा रही है। समस्या है-यहाँ पुराने शिल्पी और उसके अप्रतिष्ठित नए उत्तराधिकारी की। इस अंक में कोणार्क मंदिर के एक कक्ष में महाशिल्पी विशु को मंदिर के मुख्य भाग विमान की रचना के लिए चिंतातुर दिखाया गया है। मंदिर सर्वांग सुंदर बना है, परंतु उसका शिखर स्थापित नहीं हो पा रहा है। विशु की इस चिंता व द्वंद्व को दूर करने में उसका पुत्र धर्मपद सहायक बनता है।
द्वितीय अंक'-
लेखक ने इस अंक में उसी कक्ष में घटित घटनाओं को दिखलाया है। उत्कल नरेश द्वारा विशु को दिए गए सम्मान को विशु धर्मपद को अनुशंसित करते हैं। उत्कल नरेश कोणार्क मंदिर के स्थापत्य की प्रशंसा करते हैं तथा महाशिल्पी विशु को सम्मान स्वरूप रत्नमाला प्रदान करते हैं, जिसका सच्चा अधिकारी विशु धर्मपद को बताता है। उसके अनुरोध पर महाशिल्पी पद का सम्मानजनक पद धर्मपद को दिया जाता है। नरसिंह के समक्ष महामात्य राजराज के अत्याचारों की लोमहर्षक कथा आती है। इसी स्थान पर महाराज को महामात्य चालुक्य राजराज के विद्रोह और आक्रमण की सूचना भी प्राप्त होती है। कोणार्क की रक्षा का वचन धर्मपद महाराज को देकर, उन्हें यहाँ के दायित्व से चिंतामुक्त करता है।
तृतीय अंक'-
तीसरा अंक संघर्षपूर्ण परिस्थितयों से भरा पड़ा है, जिसमें सभी पात्र विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए निकलते हैं। अपने पुत्र की रक्षा के लिए अधीर व युद्ध की विभीषिका से त्रस्त विशु का द्वंद्वपूर्ण होना उसके पश्चाताप का चरमोत्कर्ष है। अंततः बहुत प्रयत्न करने पर भी वह धर्मपद की रक्षा करने में असमर्थ होता है। धर्मपद युद्ध करते हुए शत्रु के हाथों बहुत ही भयावह मृत्यु को प्राप्त होता है। अंत में राजराज के मंदिर में घुसने की चेष्टा को निष्फल करने के लिए विशु शिखर भाग को ध्वस्त कर देता है। राजराज और सैनिकों की मृत्यु के पश्चात वह भी प्राणोत्सर्ग कर धर्मपद के पास चला जाता है। इस प्रकार तृतीय अंक' बहुत ही मार्मिक व त्रासदपूर्ण घटनाओं और विषम स्थितियों से गुज़र कर समाप्त होता है।
कोणार्क नाटक का उद्देश्य -
'कोणार्क' नाटक के माध्यम से नाटककार का उद्देश्य 'कलावाद की समस्या एवं समाधान' स्पष्ट प्रकट हो रहा है। नाटककार अपने नाटक के माध्यम से महाशिल्पी और अन्य शिल्पियों के संघर्ष और द्वंद्व को पूरी मार्मिकता से उभारता है। वह केवल एक कलाकार की ललित कला अथवा करुण कथा का ही वर्णन नही कर रहा है, बल्कि उसके माध्यम से कलाकार के स्वाभिमान की रक्षा और अत्याचारों का विरोध करने की प्रेरणा भी देता है। कोणार्क एक उदेश्यपूर्ण नाटक है जगदीश चंद्र माथुर ने इतिहास, संस्कृति और समकालीनता को मिलाकर समय की सीमाहीनता की धारणा और माननीय सत्य की आस्था को परिपुष्ट किया है। इस नाटक में घटनाओं मौन नाटकीयता के बीच रचनाकार ने महाशिल्पी विशु की विंता और धर्मपद की सूझ बूझ और साहस का जो अदभुत प्रयोग किया है. यह व्यवस्था की अधिनायकवादी प्रति से लड़ने और जूझने की प्रक्रिया में इस नाटक को एक महत्त्वपूर्ण बना देता है। सच जो यह है कि आलोच्य नाटक कला का ऐसा भाष्य है, जिसमें इतिहास और जनश्रुति, स्वप्न और सत्य, भावना और तर्क, व्यष्टि और समिष्टि, अतीत और वर्तमान एकात्म हुए से परिलक्षित होते हैं। एक तरह से यह नाटक अंतर्मुखी और ऊर्ध्वमुखी दोनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधि है। इस नाटक में मुख्य रूप से तीन प्रकार के द्वन्द्व को स्वर दिया गया है-
1.सृजन और ध्वंस का
2.नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी का
3.राजसत्ता और जनसत्ता का
'कोणार्क' नाटक की विचारगत विशेषताएँ-
1.कोणार्क की ऐतिहासिकता-
'कोणार्क' नाटक का कथानक ऐतिहासिकता से भरपूर है। यह नाटक कोणार्क के सूर्य मंदिर पर आधारित है । छोटे-छोटे अंकों के भीतर एक विराट युग का स्पंदन गागर में सागर की तरह छलक उठता है। उपक्रम तथा उपसंहार लेखक के अत्यन्त मौलिक प्रयोग हैं, कोणार्क का सूर्य मंदिर (जिसे अंग्रेज़ी में ब्लैक पगोडा भी कहा गया है), भारत के उड़ीसा राज्य के भुवनेश्वर जिले के पुरी नामक शहर में स्थित है। इसे लाल बलुआ पत्थर एवं काले ग्रेनाइट पत्थर से १२३६– १२६४ ई. पू. में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। यह मंदिर, भारत की सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। इसे युनेस्को द्वारा सन १९८४ में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर सूर्य देव(अर्क) के रथ के रूप में निर्मित है। इस को पत्थर पर उत्कृष्ट नक्काशी करके बहुत ही सुंदर बनाया गया है। संपूर्ण मंदिर स्थल को एक बारह जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते सूर्य देव के रथ के रूप में बनाया है। मंदिर अपनी शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है। नाटक उस काल की परिस्थितियों में इस मंदिर के निर्माण और विनाश की कहानी को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में वर्णित किया है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि वर्तमान संदर्भों में कोणार्क की ऐतिहासिकता पूर्णतः प्रांसगिक है।
2.कौतूहल और स्वच्छंद प्रेमाकुलता-
माथुर जी के नाटकों में कौतूहल और स्वच्छंद प्रेमाकुलता है। फ्रायड के मनोविश्लेषण के अनुसार कोणार्क विशु की कामभावनाजन्य प्रेम का उदात्तीकरण है। समसामयिक को अनुभव के रूप में अनुभूत करके उसकी प्रामाणिकता को संस्कृति के माध्यम से सिद्ध करने का जो आग्रह उनके नाटकों में हैं, उसकी रचनात्मक संभावना का प्रमाण 'कोणार्क में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कोई नारी पात्र नही है, पर नारी जीवन की संवेदनाएं और प्रणय चेतना पूरी शिद्दत के साथ सामने आई हैं। इस नाटक के समकालीन सर्जन के केंद्र में प्रणयिनी और मां के रूप में एक छायावादी नारी है, किंतु इसके कर्म की परिधि पुरुष द्वारा अंकित है।
3.व्यक्तिगत वैषम्य के साथ विविध समस्याओं का अंकन-
लेखक ने व्यक्तिगत वैषम्य के साथ सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य समस्याओं का अंकन कोणार्क नाटक में बहुत ही कुशलता के साथ किया है। यही कारण है कि कोणार्क सच्चे अर्थों में मानव मन की उद्वेलित भावनाओं एवं द्वंद्वों का चित्रण करने में सफल हुआ है। विशु के माध्यम से नाटककार ने मानवीय दुर्बलता, विवशता एवं छटपटाहट को मार्मिक वाणी प्रदान की है, जिसमें कहीं एक प्रेमी का द्वंद्व छलकता है, कहीं पिता एवं शिल्पी मन का संघर्ष फूट पड़ता है। स्वयं माथुर जी के शब्दों में- "प्रण की अठखेलियों और भाग्य के थपेड़ों के आधार पर कोणार्क के खंडहरों का सहारा ले एक रोचक कथापट प्रस्तुत कर देने में मुझे संतोष नहीं हुआ। मुझे तो लगा, जैसे कलाकार को युग-युग के मौन-पुरुष, जो सौंदर्य-सृजन के सम्मोहन में अपने को भूल जाता है, कोणार्क के खंडन के क्षण में फूट निकला हो। चिरंतन मौन ही जिसका अभिशाप है, उस पुरुष को मैंने वाणी देने की धृष्टता की है।"
इस प्रकार इस नाटक में जहाँ एक ओर व्यक्तिगत वैमनस्य के साथ सामाजिक-आर्थिक समस्या का भी चित्रण किया गया है, तो वहीं दूसरी ओर राजा नरसिंह देव के माध्यम से राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों का चित्रण किया गया है।
4. यथार्थ संवेदना एवं मानवीय सत्य का चित्रण-
'कोणार्क' नाटक में जगदीश चंद्र माथुर जीवन की यथार्थ संवेदना को चित्रित करते हैं। तात्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का यथार्थ चित्रण हुआ है, जिसमें उनके महामात्य चालुक्य के माध्यम से राज्य में होने वाल षड्यंत्र तथा उसके मध्य आम-आदमी की त्रासदीय स्थितियों को झेलते हुए, उनका प्रतिनिधित्व करता हुआ शिल्पी है। सभी किसी न किसी विषम स्थिति में मानसिक व शारीरिक कष्ट को भोगते हैं। उनके श्रम का कोई मूल्य नहीं है। बस जीवन में कुछ कर गुजरने की अदम्य लालसा ही इन्हें जुझारू बनाए हुए हैं, जिसका प्रतिनिधित्व धर्मपद करता हैं। उसकी ही वाणी इन निरीह जनता की पुकार महाराज के कानों तक पहुँचाती है। जो इन मार्मिक शब्दों में साक्षात् हो उठता हैं। आइए एक उदाहरण देखते हैँ- धर्मपद कहता है कि "मैं तर्क करने नहीं आया हूँ। मैं तो एक ऐसे संसार की ओर आपका ध्यान खींचना चाहता हूं जो आपके निकट होते हुए भी आपकी आँखों से ओझल हो गया है। इस मंदिर में बरसों से 1200 से ऊपर शिल्पी काम कर रहे हैं। इनमें से कितनों की पीड़ा से आप परिचित हैं? जानते हैं आप कि महामात्य के भृत्यों ने इनमें से बहुतों की ज़मीन छीन ली है, कइयों की स्त्रियों को दासियों की तरह काम करना पड़ा है, और सारे उत्कल में अकाल पड़ रहा है।" यह नाटक यथार्थवादी नाट्य लेखन परपरा का पहला ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें विशु जैसे एक कलाकार की प्रतिशोध-भावना का जीवंत चित्रण हुआ है। हर कलाकार के मन में दो प्रकार की भावनाएँ साथ साथ चलती है, नाटककार ने कलाकार की भावना, उसके आत्मसम्मान और उसके प्रतिशोध को एक ओर उभारा है, तो वहीं दूसरी ओर उसने राजा और प्रजा के संबंधों पर भी प्रश्न खड़े किए है।
5. इतिहास, संस्कृति और समकालीनता की त्रिवेणी-
ऐतिहासिक घटनाओं से भरपूर होने के बाद भी ये नाटक समसामयिक घटनाओं की पृष्ठभूमि के लिए भी आधार प्रदान करता है। कोणार्क एक उत्तम नाटक है, जिसमें इतिहास, संस्कृति और समकालीनता मिलकर मानवीय सत्य की आस्था को परिपुष्ट किया गया हैं। घटना की तथ्यता और नाटकीयता के बावजूद महाशिल्पी विशु की चिंता और धर्मपद का साहसपूर्ण प्रयोग, व्यवस्था की अधिनायकवादी प्रवृत्ति से लड़ने और जूझने की प्रक्रिया एवं उसकी परिणति का संकेत नाटक को महत्त्वपूर्ण रचना बना देता है। वस्तुतः कोणार्क' का संपूर्ण कथानक ऐतिहासिक त्रासदी से आच्छादित होने पर भी पूर्णतः समसामयिक पृष्ठभूमि को द्वंद्व प्रदान करता है।
6.कल्पना की रचनात्मक सामर्थ्य एवं संप्रेषणात्मक प्रभाव-
नाटक का कथानक संघर्षपूर्ण परिस्थितियों से भरा है, पर कथ्य का गठन तथ्यों की अपेक्षा नाटककार की कल्पना और अनुभूति के संघर्ष पर अधिक आश्रित है। कल्पना का यही रचनात्मक सामर्थ्य और संस्कृति का समकालीन अनुभव 'कोणार्क' नाट्य कृति की सफलता का कारण है। इस प्रकार लेखक ने तथ्यों पर कम और कल्पना तथा अनुभूति पर अधिक जोर दिया है। कोणार्क के अंत और घटनात्मक तीव्रता तथा परिसमाप्ति पर विवाद संभव है, परंतु उसके संप्रेषणात्मक प्रभाव पर प्रश्न चिन्ह संभव नहीं है।
7.प्रगतिवादी विचारधारा का प्रभाव-
इस नाटक में धर्मपद जैसे पात्र की वाणी से लगता है, मानो आज के युग की ध्वनि निकल रही हो, जिसमें शताब्दियों से पीड़ित, उपेक्षित और मूक जनता की वेदना मुखरित हो उठी है। यहाँ साम्राज्यशाही के विरुद्ध जनता की महान शक्ति को स्वर प्रदान किया गया है। ऐसी स्थिति में यदि विशु की दृष्टि स्वच्छंदतावादी है, तो धर्मपद प्रगतिवादी विचारधारा का प्रतिनिधि है। कहीं कहीं लगता है कि इस नाटक में मार्क्सवाद का प्रभाव भी है। धर्मपद के अनेक कथोपकथनों में तो मार्क्स के विचारों की प्रतिध्वनि साफ साफ सुनाई देती है।
8.काव्यमय और रूमानी नाटकीयता-
नाटक के पहले अंक में ज्योतिषी द्वारा कोणार्क का पूरा होने के साथ ही आकाश में उड़ जाने की भविष्यवाणी और तीसरे अंक में सचमुच उसके टूट जाने में अद्भुत नाट्य-विडम्बना है। इसी प्रकार, विशु द्वारा निर्मित सौम्यश्री की प्रतिमा पर कंठाभरण पर अंकित कामदेव की मनोरम छवि के तीसरे अंक में, पर्मपद के गले से गिरे हाथी दाँत के कंकण पर खुदी आकृति की समानता के नाटकीय उद्घाटन से धर्मपद का श्रीधर अर्थात् विशु और सारिका की संतान सिद्ध होना जीव-शास्त्र और मनोविज्ञानानुकूल होने के साथ-साथ अत्यंत काव्यमय और रूमानियत-अनुवैक्षित पृष्ठभूमि से अनुरंजित है।
9.. पात्र और चरित्र चित्रण-
'कोणार्क की कथा और उसके सभी पात्र हिन्दी नाटक जगत की संपूर्ण स्थिति का प्रतीकात्मक चित्र उपस्थित करते हैं। चरित्र-चित्रण में माथुर ने मनोवैज्ञानिक दृष्टि अपनाकर चरित्रों को प्रभावशाली बनाया है। 'कोणार्क' के पात्र अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व और चारित्रिक विशेषताएँ रखते हैं। इन विशेषताओं को अंकित करने में लेखक को पूरी सफलता प्राप्त हुई है। कोई नारी पात्र नही है, पर नारी जीवन की संवेदनाएं और प्रणय चेतना पूरी शिद्दत के साथ सामने आई हैं। विशु मानव मन का उद्भावक और कलाकार के शाश्वत द्वंद्व का तो धमपद पुरुषार्थ का प्रतीक बन कर उभरा है। इस नाटक के समकालीन सर्जन के केंद्र में प्रणयिनी और मां के रूप में एक छायावादी नारी है, किंतु इसके कर्म की परिधि पुरुष द्वारा अंकित है। इस नाटक में राजा और प्रजा के रिश्ते तथा अत्याचार और विद्रोह के आंतरिक सूत्र अपने पूर्ण प्रभाव से अंकित हुए हैं। रचनाकार ने अपनी पात्र संरचना में मर्द और औरत के पेचीदा रिश्ते, राजनीतिक षड्यंत्र, कला और मनोविज्ञान के स्रोत, राजा और प्रजा, कलाकार का दायित्व और सामाजिकता तथा सेक्स और नैतिकता जैसे प्रश्न बड़ी कलात्मकता से उद्घाटित किए हैं।
10.. रंगमंचीयता एवं अभिनेयता-
रंगमंचीयता की दृष्टि से देखें तो यह कहा जा सकता है कि लेखक ने इसका विशेष ध्यान रखा है। ध्वनि, वेशभूषा आदि से संबंधित रंग-निर्देश पर्याप्त व यथास्थान उपस्थित हैं जैसे- "झीने अंधकार में कोणार्क के खंडहर की हल्की झलक दीख पड़ती है।" ऐसे दिशानिर्देश मंचन में सहायक बनते दिख रहे हैं। ‘कोणार्क’ नाटक में 'भाषा' और ‘संवाद-योजना’ दोनों ही अभिनेयता और रंगमंच के अनुकूल है।
11.शैल्पिक सौंदर्य-
जगदीश चंद्र माथुर ने 'कोणार्क' नाटक में अपने शैल्पिक प्रयोगों के माध्यम से हिन्दी रंगमंच व नाट्य परंपरा को एक बार पुनः जोड़ दिया। कोणार्क नाटक में कथावस्तु सुसंगठित और प्रभावशाली हैं। इनका काव्यत्व प्रसाद की तरह नाटकों पर हावी नहीं होता, बल्कि यह कथावस्तु, नाट्य-स्थितियों और रचनातंत्र के भीतर से निकलता है।
नाटक की भाषा पात्र, विषय और भाव के अनुकूल है तथा शैली मँजी हुई है।।जगदीश चन्द्र माथुर ने सरल, सुबोध खड़ी बोली में इस नाटक की रचना की है। विषय, पात्र तथा अवसर के अनुरूप शब्दावली एवं मुहावरों आदि का प्रयोग करने में आप कुशल हैं। पात्रों के संवादों में चारित्रिक विशेषताओं को उद्घाटित करने की पूर्ण क्षमता है।‘कोणार्क’ नाटक में 'भाषा' और ‘संवाद-योजना’ दोनों ही अभिनेयता और रंगमंच के अनुकूल है। कथोपकथन सुगठित और सजीव हैं। कथोपकथनों के माध्यम से पात्रों की मानसिकता को व्यक्त किया गया है। कथोपकथन देशकाल व वातावरण के अनुकूल हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि नाटक में संगठन के सभी पक्षों पर सम्यक दृष्टिपात किया गया है। यही कारण है कि माथुर हिन्दी साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण नाटककार एवं एकांकीकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
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