द्विवेदी युगीन काव्य की विशेषताएं*

*द्विवेदी युगीन काव्य की विशेषताएं* 

आधुनिक कविता के दूसरे पड़ाव (सन् 1903 से 1916) को द्विवेदी-युग के नाम से जाना जाता है। डॉ नगेन्द्र ने द्विवेदी युग को 'जागरण-सुधार काल' भी कहा जाता है और इसकी समयावधि 1900 से 1918 ई. तक माना। वहीं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी युग को 'नई धारा: द्वितीय उत्थान' के अन्तर्गत रखा है तथा समयावधि सन् 1893 से 1918 ई. तक माना है। यह आधुनिक कविता के उत्थान व विकास का काल है। 
 इस युग के प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी है। इन्होने " सरस्वती " पत्रिका का सम्पादन किया। इस पत्रिका मे ऐसे लेखों का प्रकाशन किया, जिसमे नवजागरण का संदेश जन-जन तक पहुँचाया गया। इस पत्रिका ने कवियों की एक नई पौध तैयार की। द्विवेदी मंडल के कवियों में मैथलीशरण गुप्त, गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही', गोपालशरण सिंह, लोचन प्रसाद पाण्डेय और महावीर प्रसाद द्विवेदी आते हैं। अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध', श्रीधर पाठक, नाथूराम शर्मा 'शंकर' और राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' आदि हैं।
 
द्विवेदी युगीन काव्य की विशेषताएं 
 इस प्रकार है--
 *भावगत विशेषताएँ** 

1 *. देशभक्ति एवं राष्ट्रीय चेतना-* 
द्विवेदी युग मे देशभक्ति को व्यापक आधार मिला। इस काल मे देशभक्ति विषयक लघु एवं दीर्घ कविताएँ लिखी गई।दूसरी ओर कविता मे लोक जीवन और प्रकृति के साथ ही राष्ट्रीय भावना की समर्थ अभिव्यक्ति हो रही थी। इस समय के प्रबंध काव्य मे कवियों ने पौराणिक और ऐतिहासिक कथानक को आधार बनाया। इस युग मे ऐतिहासिकता, पौराणिकता मे भी राष्ट्रीय चेतना राष्ट्रीय भावना का स्वर ही उभरकर सामने आता है।द्विवेदीयुगीन कवियों ने जनमानस के बीच राष्ट्रप्रेम का लहर चलाई। स्वतन्त्रता के प्रति जनमानस में चेतना का संचार किया। इस युग के रचनाकारों का राष्ट्रप्रेम भारतेन्दु युग की भाँति सामयिक रुदन से नहीं जुङा है, बल्कि समस्याओं के कारणों पर विचार करने के साथ-साथ उनके लिए समाधान ढूँढने तक जुङा है
’’हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी।
आओ मिलकर विचारें ये समस्याएँ सभी।।’’

2. *अंधविश्वासों तथा रूढ़ियों का विरोध* 
इस काल की कविताओं मे सामाजिक अंध विश्वासों और रूढ़ियों पर तीखे प्रहार किए गए इसीलिए यह युग सुधारवादी युग भी कहलाता है। इस युग के कवियों ने सामाजिक समस्याओं, यथा – दहेज प्रथा, नारी उत्पीङन , छूआछूत, बाल विवाह आदि को अपनी कविता का विषय बनाया।

3. *मानव प्रेम-* 
द्विवेदी युगीन कविताओं मे मानव मात्र के प्रति प्रेम की भावना विशेष रूप से मिलती है। इस काल का कवि संकीर्णताओं से ऊपर उठ गया है। वह मानव-मानव में भ्रातृ-भाव की स्थापना करने के लिए कटिबद्ध है। अत: वह कहता है-
"जैन बोद्ध पारसी यहूदी,मुसलमान सिक्ख ईसाई।
कोटि कंठ से मिलकर कह दो हम हैं भाई-भाई॥"

4. *प्रकृति चित्रण-* 
 द्विवेदी युग में प्रकृति को काव्य-विषय के रूप में पहली बार महत्वपूर्ण स्थान मिला। इसके पूर्व प्रकृति या तो उद्दीपन के रूप में आती थी या फिर अप्रस्तुत विधान का अंग बनकर। वहीं इस युग में प्रकृति को आलंबन तथा प्रस्तुत विधान के रूप में मान्यता मिली। द्विवेदी युग में प्रकृति का गतिशील चित्रण न होकर स्थिर चित्रण हुआ है।
इस युग के कवियों ने प्रकृति के अत्यंत रमणीय चित्र खींचे है। प्रकृति का स्वतन्त्र रूप मे मनोहारी चित्रण मिलता है।द्विवेदी युग के कवि का ध्यान प्रकृति के यथा-तथ्य चित्रण की ओर गया। प्रकृति चित्रण कवि के प्रकृति-प्रेम स्वरूप विविध रूपों में प्रकट हुआ। श्रीधर पाठक,रामनरेश त्रिपाठी,हरिऔद्य तथा मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं में प्रकृति आलंबन,मानवीकरण तथा उद्दीपन आदि रूपों में चित्रित किया गया है। श्रीधर पाठक ने काश्मीर की सुषमा का रमणीय वर्णन करते हुए लिखा-
"प्रकृति जहां एकांत बैठि निज रूप संवारति।
पल-पल पलटति भेष छनिक छवि छिन-छिन धारति॥"

5. *आदर्शवादिता -* 
इस युग की कविता प्राचीन प्राचीन सांस्कृतिक आदर्शों से युक्त आदर्शवादी कविता है। इस युग के कवि  की चेतना नैतिक आदर्शों को विशेष मान्यता दे रही थी,क्योंकि उन्होंने वीरगाथा काल तथा रीतिकाल की शृंगारिकता के दुष्परिणाम देखे थे। अत: वह इस प्रवृत्ति का उन्मूलन कर देश को वीर-धीर बनाना चाहता है-
"रति के पति! तू प्रेतों से बढ़कर है संदेह नहीं,
जिसके सिर पर तू चढ़ता है उसको रुचता गेह नहीं।"
इस काल का कवि सौंदर्य के प्रति उतना आकृष्ट नहीं,जितना कि वह शिव की ओर आकृष्ट है।

6. *नारी का उत्थान -* 
इस काल के कवियों ने नारी के महत्त्व को समझा,उस पर होने वाले अत्याचारों का विरोध किया। अब नारी भी लोक-हित की आराधना करने वाली बन गई। अत: प्रिय-प्रवास की राधा कहती है-
"प्यारे जीवें जग-हित करें,गेह चाहे न आवै।" प्रतापनारायण मिश्र नारी के वैधव्य जीवन और बाल विधवाओं की तरुण अवस्थाओं को देखकर रो पङते हैं।
’’कौन करेजा नहीं कसकत, सुनी विपत्ति बाल विधवन की।’’
नारी की दयनीय दशा का चित्रण मैथिलीशरण गुप्त जी करते हुए कहते है कि
’’अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।’’
द्विवेदी युग  काव्य धारा ने उपेक्षित नारियों को अपने काव्य में स्थान दिया।  ’साकेत’ के माध्यम से उर्मिला का, ’विष्णुप्रिया’ के माध्यम से चैतन्य महाप्रभु की पत्नी’और यशोधरा’ के माध्यम से गौतम बुद्ध की पत्नी का उत्सर्ग  रेखांकित किया गया।
’’सखी वे मुझको कहकर जाते,
प्रियतम के प्राणों को पल में स्वयं सुसज्जित करके।
भेज देती रण में, छत्र धर्म के नाते
सखी वे मुझको कहकर जाते।।"

 *कलागत विशेषताएँ* 

1. *खड़ी-बोली का परिनिष्ठित रूप-* 
1903 ई. में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक बने, संपादक बनने के बाद द्विवेदी जी हिंदी भाषा के परिष्कार पर विशेष ध्यान दिया। इन्होंने सरस्वती के माध्यम से कवियों को नायिका भेद जैसे विषय से हट कर अन्य विषयों पर कविता लिखने के लिए प्रेरित किया तथा ब्रजभाषा के स्थान पर काव्यभाषा के रूप में खड़ीबोली का प्रयोग करने का सुझाव दिया ताकि गद्य और काव्य की भाषा में एकरूपता आ सके। खड़ी बोली मे काव्य रचना द्विवेदी युग की सबसे महत्वपूर्ण है। खड़ी बोली हिन्दी को सरल, सुबोध तथा व्याकरण सम्मत परिनिष्ठित स्वरूप प्रदान किया।
द्विवेदी युग के अनेक कवियों ने ब्रजभाषा छोड़कर खड़ी बोली को अपनाया। इस काल मे खड़ी बोली को ब्रजभाषा के समक्ष काव्य भाषा के रूप मे प्रतिष्ठित किया गया। खड़ी बोली व्याकरण सम्णत, परिष्कृत एवं संस्कारित रूप ग्रहण कर रही थी 

2. *छन्द विविधता-* 
इस युग में वर्ण्य विषय के समान छन्दों में भी विविधता स्पष्ट दिखाई देती है। इस युग के कवि दोहा, कविता या  सवैया तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि रोला, छप्पय, कुण्डलिया, सार, गीतिका, हरिगीतिका, लावनी, वीर आदि छन्द भी

3. *विविध काव्य रूपों का प्रयोग-* 
द्विवेदी युग में लगभग सभी काव्य रूपों का प्रयोग हुआ। मुक्तक, प्रगति प्रभृति सभी काव्यरूपों में रचना हुई। हिन्दी के अनेक श्रेष्ठ खण्डकाव्य इसी युग में लिखे गए। द्विवेदी युग में सभी कवि मुक्तक रचना का ओर प्रवृत्त हुए।इस काल मे प्रबंध काव्य भी पर्याप्त संख्या मे लिखे गए। 

4. *शैली -* 
 शैली की दृष्टि से इस युग का काव्य विविधमुखी है। गोपालशरण सिंह आदि पुराने ढ़ंग के और नई शैली के मुक्तक लिख रहे थे तथा उपाध्याय एवं गुप्त जी प्रबंध शैली को महत्व दे रहे थे। गीति-शैली के काव्यों का सृजन भी होने लगा था।काव्य के कलेवर के निर्माण में स्वच्छंदता से काम लिया गया। 

5. *वर्णन प्रधानता एवं इतिवृत्तात्मकता-* 
 इतिवृत्तात्मकता का अर्थ है वस्तु वर्णन या आख्यान की प्रधानता। आदर्शवाद तथा बौद्धिकता की प्रधानता के कारण द्विवेदी युग के कवियों ने वर्णन प्रधान इतिवृत्तात्मकता को अपनाया। इतिवृत्तात्मकता के कारण इस युग में इतिवृत्त (कथा) पर अधिक बल दिया जाने लगा और प्रबन्धात्मक रचनाएँ अधिक लिखी जाने लगी।
मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ जैसे ’साकेत’ ’जयद्रथवध’ ’पंचवटी’ ’यशोधरा’ द्वापर आदि प्रबन्धकाव्य है। इसी प्रकार अयोध्यासिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ की रचनाओं ’प्रिय प्रवास’ तथा ’वैदेही वनवास’ में इतिवृत्तात्मकता की प्रधानता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि द्विवेदी युगीन कविताओं मे राष्ट्रीयता, आदर्शवाद, नैतिकता व मानव मात्र के प्रति प्रेम की भावना विशेष रूप से मिलती है। यह युग कविता मे खड़ी बोली के प्रतिष्ठित होने का युग है।साथ ही विकसित चेतना के कारण कविता नई भूमि पर प्रतिष्ठित हुई। द्विवेदी युग का साहित्य अनेक अमूल्य रचनाओं का सागर है, इतना समृद्ध साहित्य किसी भी दूसरी भाषा का नहीं है और न ही किसी अन्य भाषा की परम्परा का साहित्य एवं रचनाएँ अविच्छिन्न प्रवाह के रूप में इतने दीर्घ काल तक रहने पाई है।

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