देव
रीतिकाल के कवियों में देव प्रतिभा संपन्न कवि माने जाते हैं। देव की रचनाओं में विषयों की विविधता बहुत मिलती है। देव किसी भी विषय को उठाकर से बड़ी कुशलता के साथ आगे बढ़ाते हैं, ऐसे स्थलों पर भाषा भावों के उमेश को देव की अभिव्यंजना शैली प्रौढ़ और प्रांजल है वे काव्य रचना करते समय भाषा के सौंदर्य, समृद्धि अलंकरण और सज्जा पर विशेष ध्यान देते हैं।
1 रीतिकालीन परंपरा के कवियों में देव का विशिष्ट स्थान है कवितत्व की दृष्टि से इनकी रचनाएं अधिक प्रभावशाली हैं।
2 देव ने कवि के गुणों, ईश्वर के प्रति प्रेम, राधा कृष्ण प्रेम, मन की चंचलता,स्त्री एवं प्रकृति सौंदर्य, सांसारिकता से विरक्ति और आस्था से संबंधित कविता लिखी है।
3 मूलतः देव रसवादी कवि हैं। श्रंगार रस के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का भाव पूर्ण वर्णन हुआ है।
4 इनकी काव्य में कल्पना की ऊंची उड़ान और सौंदर्य का बोध भी है। बिम्ब योजना एवं अभिव्यंजना कौशल के माध्यम से उन्होंने सुंदरता की सृष्टि की है।
5 देव ने साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया। इनकी भाषा में लाक्षणिकता एवं व्यंजकता का गुण दिखाई देता है, भाषा भाव व विषय के अनुरूप है।
6 कवित्त और सवैया छंद में वे सिद्धहस्त थे।छंद की गति यति लय और तुकबंदी और गेयता के अनुकूल है
7 अलंकारों का सौंदर्य दर्शनीय है अनुप्रास उपमा रूपक यमक अलंकारों के प्रयोग से कविता की कला में उत्कृष्टता आयी है।
8 मुक्तक शैली है। उनकी शैली में अलंकारिता ,चमत्कार ,उक्ति विचित्रता,
अर्थ की गंभीरता ,सामासिकता, बिम्बात्मकता
एवं चित्रात्मजता सहज ही देखने को मिलती है
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