कहानी की तात्त्विक समीक्षा


प्रेमचंद के अनुसार "कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक 
महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता। उन्होंने कहा है कि "कहानी (गल्प) एक रचना है, जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास, सब उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं। उपन्यास की भाँति उसमें मानव-जीवन का संपूर्ण तथा वृहत रूप दिखाने का प्रयास नहीं किया जाता। वह ऐसा रमणीय उद्यान नहीं, जिसमें भाँति-भाँति के फूल, बेल-बूटे सजे हुए हैं, बल्कि एक गमला है जिसमें एक ही पौधे का माधुर्य अपने समुन्नत रूप में दृष्टिगोचर होता है।’ इस प्रकार कहानी वह गद्य रचना है, जिसमें जीवन के किसी एक अंग का सर्वांग प्रस्तुतिकरण होता है।

कहानी के तत्त्व-
कहानी की रचना एक कलात्मक विधान है, जो अभ्यास और प्रतिभा के द्वारा रूपाकार ग्रहण करती है। रोचकता, प्रभाव तथा वक्‍ता एवं श्रोता या कहानीकार एवं पाठक के बीच यथोचित सम्बद्धता बनाए रखने के लिए कहानियों में कथावस्तु, पात्र अथवा चरित्र-चित्रण, कथोपकथन अथवा संवाद, देशकाल अथवा वातावरण, भाषा-शैली तथा उद्देश्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व माने गए हैं-

कहानी के प्रमुख तत्त्व-

1. कथावस्तु –
कहानी के ढाँचे को कथानक अथवा कथावस्तु कहा जाता है। प्रत्येक कहानी के लिए कथावस्तु का होना अनिवार्य है, क्योंकि इसके अभाव में कहानी की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कथावस्तु जीवन की भिन्न- मिन्न दिशाओं और क्षेत्रों से ग्रहण की जाती है- पुराण, इतिहास, राजनीतिक, समाज आदि। कहानीकार इनमे से किसी भी क्षेत्र से कथावस्तु का चुनाव करता है और उसके आधार पर कथानक की अट्टालिका खड़ी करता है।

कथावस्तु में घटनाओं की अधिकता हो सकती है और एक ही घटना पर उसकी रचना भी हो सकती है, लेकिन, उनमें कोई न कोई घटना अवश्य होगी। वैसे तो कथानक की पांच दशाएं होती है-आरंभ ,विकास ,कोतुहल ,चरमसीमा और अंत, परंतु प्रत्येक कहानी में पांचों अवस्थाएं नहीं होती।

(कहानी का नाम)"उसने कहा था" कहानी में कथानक संघर्ष की स्थिति को पार करता है , विकास को प्राप्त कर कौतूहल को जगाता हुआ , चरम सीमा पर पहुंचता है और उसी के साथ कहानी का अंत हो जाता है।
(कहानी का नाम ) "उसने कहा था" कथानक के चार अंग हैं - आरम्भ, आरोह, चरम स्थिति एवं अवरोह।
(कहानी की मुख्य घटनाएं).................…..................

(कहानी का नाम)"उसने कहा था" का कथा-विन्यास अत्यंत विराट फलक पर किया गया है। कहानी जीवन के किसी प्रसंग विशेष, समस्या विशेष या चरित्र की किसी एक विशेषता को ही प्रकाशित करती है, उसके संक्षिप्त कलेवर में इससे अधिक की गुंजाइश नहीं होती है, किंतु यह कहानी लहना सिंह के चारित्रिक विकास में उसकी अनेक विशेषताओं को प्रकाशित करती हुई उसका संपूर्ण जीवन-वृत्त प्रस्तुत करती है, बारह वर्ष की अवस्था से लेकर प्राय: सैंतीस वर्ष, उसकी मृत्यु तक की कथा-नायक का संपूर्ण जीवन इस रूप में चित्रित होता है कि कहानी अपनी परंपरागत रूप-पद्धति को चुनौती देकर एक महाकाव्यात्मक औदात्य लिये हुए है । वस्तुत: पांच खण्डों में कसावट से बुनी गयी यह कहानी सहज ही औपन्यासिक विस्तार से युक्त है किंतु अपनी कहन की कुशलता से कहानीकार इसे एक कहानी ही बनाये रखता है। दूसरे, तीसरे और चौखे खण्ड में विवेच्य कहानी में युद्ध कला, सैन्य-विज्ञान और खंदकों में सिपाहियों के रहने-सहने के ढंग का जितना प्रामाणिक, सूक्ष्म तथा जीवंत चित्रण इस कहानी में हुआ है, वैसा हिंदी कथा साहित्य में विरल है। मौलिकता,मौलिकता से तात्पर्य यहाँ नवीनता से है। सम्भाव्यता, सुगठितता एवं रोचकता चारों गुण स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। ‘संक्षिप्तता’ इस कहानी के कथानक का अनिवार्य गुण है। कहानी का आरम्भ, मध्य और अन्त सुगठित है,

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इस कहानी के शरीर मेें कथानक हड्डियों के समान है, अतः (कहानीकार का नाम)ने कथानक की रचना अत्यन्त वैज्ञानिक तरीके से क्रमिक विकास के रूप में की है।

2. पात्र का चरित्र चित्रण –
कथावस्तु के बाद चरित्र-चित्रण कहानी का अत्यन्त आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। वस्तुतः पात्र कहानी के सजीव संचालक होते हैं। पात्रों के माध्यम से एक ओर कथानक का आरम्भ, विकास और अन्त होता है, तो दूसरी ओर हम कहानी में इनसे आत्मीयता प्राप्त करते हैं।
पात्रों के गुण-दोष को उनका 'चरित्र चित्रण' कहा जाता है। कहानी में वर्णित व्यक्ति ही कहानी में चरित्र कहलाता है।

कहानी का नाम) "उसने कहा था" कहानी में यथार्थवादी मनोविज्ञान पर बल दिया गया है अतः उसमें चरित्र चित्रण को अधिक महत्त्व दिया गया है। चरित्र चित्रण से विभिन्न चरित्रों में स्वाभाविकता उत्पन्न कर घटना और कार्य व्यापार के स्थान पर पात्र और उसका संघर्ष को ही कहानी की मूल धुरी बना दिया है।

(कहानी का नाम)"उसने कहा था" ढेर सारे किरदारों के बावजूद इस कहानी में तीन ही मुख्य किरदार हैं। (कहानी के मुख्य पात्रों के नाम) लहना सिंह, सूबेदारनी और वजीरा सिंह. बोधा बच्चा है, सूबेदार पुत्र मोह में कमजोर, सो बेटे को लेकर रणभूमि से घर लौट जाता है. हालांकि लहना की भी एक पत्नी है पर उसका कोई जिक्र यह कहानी नहीं करती. लहना के मरते वक़्त भी वह उसकी स्मृतियों में नहीं आती, आती है तो अमृतसर की गलियों वाली वह बच्ची. वह पत्नी के गोद में मरने की बात भी नहीं करता, भाई की गोद में मरना चाहता है. जाहिर है लेखक ने ऐसा लहना के उस बच्ची के लिए प्रेम को बताने के लिए ही किया है नहीं तो इस तरह उसका चरित्र कमजोर हो जाता. लहना और सूबेदारनी का वह अमरप्रेम फिर शायद उस तरह अमर न हो पाता. इन तीन के अलावा जो भी चरित्र हैं वे वक्त-जरूरत नायक नायिका के चरित्र को रचने और उभारने के लिए हैं। ( मुख्य पात्रों के गुण एवं चारित्रिक विशेषताएँ) लहना का चरित्र एक ऐसा विशिष्ट चरित्र है, जिसमें कई सारी खूबियां और नायकत्व कूट कूटकर भरा गया है. वह अपने भाई को बहुत चाहता है. देश को अगाध प्रेम करता है. बेटे से जिसे बहुत लगाव है. गांव जिसकी रगों में दौड़ता है और प्रेम तो उसके लिए जिंदगी के हर द्वन्द और दुविधाओं से भी बहुत ऊपर जीवन-मृत्यु का सबब है। सिर्फ 12 वर्ष की छोटी सी उम्र में वह उस नन्ही बालिका (बाद की सूबेदारनी) को बचाने की खातिर अपनी जान से खेल जाता है. और 37 साल की उम्र में अपने परिवार और सपनों की परवाह न करते हुए, उसको दिए वचन की रक्षा के लिए उसके घायल बेटे को उसके पति के साथ घर भेजकर, खुद के लिए मृत्यु चुन लेता है. और तो और वह जर्मन सैनिक को अपनी बातों में लाकर और फंसाकर मार भी देता है. यानी वो बुद्धिमान भी है। इस प्रकार (कहानीकार का नाम) पात्रों के बाह्य और अंतरिक पक्षों का अधिक से अधिक मनोविश्र्लेषण कर उन्हें मूल घटना के साथ गहराई से जोड़ देता है।

कहानी के छोटे आकार तथा तीव्र प्रभाव के कारण पात्रों की संख्या सीमित है। मुख्य पात्र के साथ साथ कहानी में दूसरे पात्र के सबसे अधिक प्रभाव पूर्ण पक्ष की उसके व्यक्तित्व की केवल सर्वाधिक पुष्ट तत्व की झलक ही प्रस्तुत की गई है। अतः कहानी के पात्र वास्तविक सजीव स्वाभाविक तथा विश्वसनीय लगते हैं। पात्रों का चरित्र आकलन (लेखक का नाम) ने दोनों प्रकार से करता है- प्रत्यक्ष या वर्णात्मक शैली द्वारा इसमें लेखक स्वयं पात्र के चरित्र में प्रकाश डालता हैऔर परोक्ष या नाट्य शैली में पात्र स्वयं अपने वार्तालाप और क्रियाकलापों द्वारा अपने गुण दोषों का संकेत देते चलते हैं।
इससे कहानी में विश्वसनीयता एवं स्वाभाविकता आ गयी है।

( कहानी का नाम) में जहाँ तक पात्रों के चयन का सम्बन्ध हैं,वे सर्वथा सजीव और स्वाभाविक हैं तथा पात्रों की अवतारणा कल्पना के धरातल से न होकर कहानीकार की आत्मानुभूति के धरातल से हुई है। (कहानी का नाम) "उसने कहा था" के पात्र विषय वस्तु से अनुकूलता, मौलिकता, स्वाभाविकता, सजीवता, यथार्थता, सहृदयता तथा अन्तर्द्वन्द्वात्मकता लिए हुए हैं

3. देशकाल व वातावरण-
देशकाल या वातावरण कहानी कला का मेरुदण्ड है। कहानी देशकाल की उपज होती है, इसलिए हर देश की कहानी दूसरे देशों से भिन्न होती है। भारत में या इस देश के किसी भी भू-भाग में लिखी कहानियों का अपना वातावरण होता है, जिसकी संस्कृति, सभ्यता, रूढि, संस्कार का प्रभाव उन पर स्वभाविक रूप से पड़ता है। यह अपने आप उपस्थिति हो जाता है। यही देशकाल व वातावरण तो आधार है, जिस पर कहानी का सारा कार्यकलाप होता है।
(कहानी का नाम) "उसने कहा था" में कहानी में वास्तविकता का पुट देने के लिए वास्तविक देशकाल अथवा वातावरण का प्रयोग किया गया है। वास्तविक जीवन देश, काल, जीवन की विभिन्न सत्-असत् प्रवृत्तियों और परिस्थितियों से निर्मित हुआ है। इन तत्त्वों को एक साथ एक ही स्थान पर चित्रित करना कहानीकार की अनूठी विशिष्टता रही है। कहानी में वातावरण भौतिक तथा मानसिक दोनों प्रकार का है। वातावरण (कहानी का नाम)को यथार्थ बनाने में सहायक दिखाई पड़ता है। अतः कहानी जिस स्थान अथवा समय से सम्बन्धित हैं, उसका यथार्थ चित्रण इस कहानी में हुआ है।

(कहानी के देशकाल व वातावरण के कुछ उदाहरण)"उसने कहा था' प्रथम विश्वयुद्ध के तुरंत बाद लिखी गई थी. तुरंत घटी घटना को कहानी में लाना उसके यथार्थ को इतनी जल्दी और इतनी बारीकी से पकड़ पाना आसान नहीं होता पर गुलेरी जी ने यह किया और खूब किया. इस कहानी में प्रेम से भी ज्यादा युद्ध का वर्णन और माहौल है. यह बताने की खातिर कि युद्ध हमेशा प्रेम को लीलता और नष्ट करता है। लहना सिंह का एक छोटा-सा सपना है, नदी के किनारे अपने गांव में, आम के पेड़ के तले भाई की गोद में मरने का. पर वह मरता है एक अनजान देश में. अपनी प्रेमिका के वचन की रक्षा करते हुए, वह सूबेदारनी के सुहाग और बच्चे को तो बचा लेता है पर अपनी बीवी और बच्चे को अनाथ कर जाता है। वातावरण का अत्यंत गहरे रंगों में सृजन गुलेरी जी की अपनी विशेषता है। कहानी का प्रारंभ अमृतसर की भीड-भरी सडकों और गहमागहमी से होता है, युद्ध के मोर्चे पर खाली पडे फौजी घर, खंदक का वातावरण, युद्ध के पैंतरे इन सबके चित्र अंकित करता हुआ कहानीकार इस स्वाभाविक रूप में वातावरण की सृष्टि करता है कि वह हमारी चेतना, संवेदना का अंग ही बन जाता है।

कहानी में भौतिक वातावरण के लिए विशेष स्थान नहीं होता फिर भी कहानीकार ने इनका संक्षिप्त वर्णन पात्र के जीवन को उसकी मनः स्थिति को समझाने में किया है। लेखक पाठक को युग विशेष में ले जाता है और सच्ची झांकी को पेश करता है। मानसिक वातावरण कहानी का परम आवश्यक तत्व है। ( कहानी का नाम) "उसने कहा था" में (मुख्य पात्र नाम)का चरित्र चित्रण में भौतिक और मानसिक वातावरण की सुंदर सृष्टि हुई है।

4. संवाद या कथोपकथन-
पहले संवाद कहानी का अभिन्न अंग माना जाता था, लेकिन अब उसकी अनिवार्यता समाप्त हो गई। ऐसे अनेक कहानियाँ लिखी गयी है, या लिखी जाती है। जिसमे संवाद का एकदम अभाव रहता है। सारी कहानी वर्णनात्मक या मनोविश्र्लेषणात्मक शैली मे लिख दी जाती है। संवाद की कहीं भी अनावश्यकता नहीं पड़ती। लेकिन संवाद से (कहानी का नाम)"उसने कहा था" के पात्र संजीव और स्वाभाविक बन गए है। इनके द्वारा पात्रों के मानसिक अन्तर्द्वन्द एवं अन्य मनोभावों को प्रकट किया गया है।
(कहानी का नाम)"उसने कहा था" में स्थगित कथन लंबे चौड़े भाषण या तर्क-वितर्क पूर्ण संवादों के लिए कोई स्थान नहीं है। नाटकीयता लाने के लिए छोटे-छोटे संवादों का प्रयोग किया गया है। संवाद , देश काल , पात्र और परिस्थिति के अनुरुप हैं।
( कहानी के कुछ संवादों के उदाहरण) कहानी के संवाद परिस्थिति के अनुकूल अपने को परिवर्तित कर लेते है। गुलेरी जी संवादों का प्रयोग करते हुए स्थिति के प्रायः सभी पहलुओं का ध्यान रखते हैं। तांगे वालों का वर्णन कस्ते हुए संवाद का रूप वैसा ही हो जाता है, जैसा तांगे वालों की वास्तविक जबान को व्यक्त करने के लिए ज़रूरी है। "हटो बाछा", "आने दो लालाजी" जैसे लघु संवादों का प्रयोग महत्वपूर्ण है। गुलेरी जी भाषा का संयमित प्रयोग करते हैं। जहाँ कम शब्दों में बात कही सकती वहीं वे मितव्ययता से काम लेते हैं। लहनासिंह और सूबेदारनी के बचपन के संबंधों का जो वर्णन हमें कहानी में मिलता है, उसके विस्तार की काफी गुंजाइश थी, लेकिन गुलेरी जी केवल " तेरी कुड़माई हो गई" वाले संवाद द्वारा उन दोनों की सारी मनोभावनाओं को व्यक्त कर देते हैं।
उनके कथोपकथन संक्षिप्त, रोचक, तर्कयुक्त तथा प्रवाहमय होकर कथा को आगे बढ़ाते हैं , पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डाल, कहानी के उद्देश्य का प्रतिपादन करते हैं। इस प्रकार कथोपकथन इस कहानी का महत्त्वपूर्ण अंग बन गए है। यदि कहानी में संवाद न होकर केवल वर्णन ही होता तो कहानी के पात्र अव्यक्त रह जाते और कहानी की प्रभावशीलता एवं संवेदनशीलता नष्ट हो जाती। साथ ही कहीं भी संवादों की अधिकता भी नहीं है कि कहानी, कहानी न रह कर एकांकी नाटक बन जाये। अतः कहानी में संवाद वर्णन में उचित समन्वय दिखाई देता है।
भाषा-शैली का निर्माण करना तथा कथा को रस की स्थिति तक पहुँचाने में भी कहानीकार ने संवादों का कुशलता के साथ प्रयोग किया है।

(कहानी का नाम) "उसने कहा था" के कथोपकथन स्वाभाविक एवं परिस्थिति के अनुकूल हैं, जिनमें जिज्ञासा एवं कुतूहलता उत्पन्न करने की क्षमता है। संक्षिप्तता एवं ध्वन्यात्मकता भी इस कहानी के कथोपकथन के गुण हैं। जहाँ तक संवादों की सवाल है. गुलेरी जी ने प्रत्येक पात्र के मुँह से वेसी ही भाषा बुलवाई है, जो उसकी स्थितियों के अनुकूल हो। आरंभ में दोनों बच्चों की बातों में वैसी ही लज्जा, अबोधधपन और पीलापन है, जो उस उम्र के बच्चों में होता है, लेकिन बाद में विभिन्न पात्रों की बातचीत में उनकी सामाजिक-पारिवारिक स्थिति के अनुसार अंतर आया है।
5. भाषा-
भाषा कहानी का पांचवाँ मूल तत्त्व है। भाषा वस्तुतः भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। अतः भाषा के लिए यह आवश्यक है कि वह सहज, सरल एवं बोधगम्य हो।
( कहानी का नाम)"उसने कहा था" कहानी की भाषा बिलकुल बोलचाल की भाषा है, जो वातावरण को सजीव कर देती है। सभी पात्रों की भाषा पर पंजाबी का प्रभाव है, जो स्वाभाविक है क्योंकि कहानी की कथावस्तु पंजावी जीवन से ही संबंधित है। पंजाबी के न जाने कितने शब्दों का प्रयोग इसे अलग बनाता है और 106 बरस पुरानी कहानी के हिसाब से तो काफी प्रयोगशील और प्रगतिशील भी है। इस कहानी का विषय भी बहुत प्रयोगधर्मी है. इतने बरस पूर्व एक प्रेम-कहानी को रचना, वह भी इस आत्मीयता और लगाव से, रचनाकार के लिए कैसा अनुभव रहा होगा यह बात सोचने और समझने की बात है। भाषा में मूल संवेदना को व्यक्त करने की पूरी क्षमता है। वह ओज एवं माधुर्य गुणों से युक्त तथा विषयानुकूल है।उसमें प्रवाहात्मकता, आलंकारिकता, चित्रात्मकता, प्रतीकात्मकता के गुण प्रमुख हैं। ध्यातव्य है कि 1915 ई. में कहानीकार इतने परिनिष्ठित गद्य का स्वरूप उपस्थित कर सकता है जो बहुत बाद तक की कहानी में भी दुर्लभ है। भाषा में कथा की बयानी के लिए सहज चापल्य तथा जीवन-धर्मी गंध है। रोजमर्रा की बोलचाल के शब्दों, वाक्यांशों और वाक्यों तथा लोकगीत की कड़ियों का प्रयोग भी कहानी को एक नयी सज धज दे कर आगे की कहानी की भाषा और शैली का मार्ग भी प्रशस्त करता है। (कहानी की भाषा व शब्दावली के कुछ उदाहरण)
इस प्रकार अनेक दृष्टियों से "उसने कहा था" हिंदी ही नहीं, भारतीय भाषाओं की ही नहीं अपितु विश्व कहानी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। (लेखक का नाम) का भाषा पर पूर्ण अधिकार है कहानी की भाषा सरल , स्पष्ट व विषय अनुरूप है। वह दुरूह ना होकर प्रभावी है , (कहानीकार का नाम) की भाषा में इतनी शक्ति है जो साधारणता पाठकों को भी अपनी ओर आकृष्ट कर लेती है।  

6.शैली-
बाबू गुलाबराय के शब्दों में ’’शैली का सम्बन्ध कहानी के किसी एक तत्त्व से नहीं वरन् सब तत्त्वों से है तथा उसकी अच्छाई एवं बुराई का प्रभाव सम्पूर्ण कहानी पर पङता है।’’ अतः प्रस्तुतीकरण के ढंग में कलात्मकता लाने के लिए कहानी को अलग-अलग शैली से सजाया जाता है।
कहानी की शैली ( कहानी का नाम) को सुसज्जित करनेवाला कलात्मक आवरण गई है। इसका संबंध कहानीकार के आन्तरिक और बाह्य दोनों पक्षों से है। (कहानीकर का नाम) अपनी कहानी को अपने प्रकार से कहना चाहता है। उसने कहानी में वर्णात्मक, संवादात्मक, आत्मकथात्मक, विवरणात्मक सभी रूप प्रयुक्त किए हैं।
(कहानी का नाम) "उसने कहा था" को प्रभावशाली बनाने के लिए लेखक थोड़े में बहुत कुछ कहने की कला में निपुण है।
कहानीकार ने अपने विषय के अनुरूप ही शैली का चयन किया है।
एक सफल शैली के सभी अपेक्षित गुण (कहानी का नाम) में मौजूद हैं – आलंकारिकता, प्रवाहात्मकता, रोचकता, व्यंग्यात्मकता, भावात्मकता, तथा प्रतीकात्मकता। कहानी की प्रेषणीयता प्रमुख रूप से शैली पर ही निर्भर है।
(कहानी की शैली का नाम) "उसने कहा था" की शैली वैसे तो वर्णनात्मक कही जा सकती है, लेकिन इसमें नाटकीयता के तत्त्व भी पर्याप्त हैं। कहानी के अंतिम भाग में उन्हें पूर्वदीप्ति शैली द्वारा एक घटना को दूसरी से जोड़ते हैं। पूर्वदीप्ति शैली का यह प्रयोग हिंदी कहानी के लिए नया ही नहीं था वरन अत्यंत प्रौढ़ प्रयोग भी था। कथ्य की सारी संभावनाएँ इसी शैली के कारण संप्रेषित हो सकी है। कथ्य के अनुकूल शैली की खोज लेखक की गहत्त्वपूर्ण सफलता है।
पूर्वदिप्ति शैली के साथ चित्रात्मक शैली, व्यंग्यात्मक शैली,कल्पनाशील शैली,आंचलिक शैली व भावप्रधान शैली का प्रयोग किया है। ( कहानीकार का नाम) की शैली पाठको को अपनी ओर आकृष्ट करने में पूर्णतः सफल रहा है।

7.उद्देश्य-
यह कहानी का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना गया है, सच तो यह है कि साहित्य की किसी विधा की रचना बिना उद्देश्य के नहीं होती। हम बिना उद्देश्य के जीवन जीना नहीं चाहते। कहानी की रचना भी बिना उद्देश्य के नहीं होटी। केवल मनोरंजन ही नहीं , अपितु उसका एक निश्‍चित उद्‍देश्य भी होता है। कहानीकार का कोई ना कोई प्रयोजन हर कहानी के रचना के पीछे रहता है। यह उद्देश्य कहानी के आवरण में छिपा रहता है। प्रकट हो जाने पर उसका कलात्मक सौंद्धर्य नष्ट हो जाता है। पहले कहानी का उद्देश्य उपदेश देना और मनोरंजन करना माना जाता है। आज इसका लक्ष्य मानव- जीवन की विभिन्न समस्याओं और संवेदनाओं को व्यक्त करना है।

(कहानी का नाम व उसका उद्देश्य)"उसने कहा था" में निश्छल प्रेम का निरूपण किया है। पांच खण्डों में और 25 वर्षों के लंबे अंतराल को खुद में समेटती यह कहानी विषय और अपने अद्भुत वर्णन में किसी उपन्यास की सी है.

प्रेम, कर्तव्य और देशप्रेम के तीन मूल उद्देश्यों से जुड़ती है। उसे अपना विषय बनाती हुई, कहीं भी अपने विषय से न भटकते हुए, न इधर उधर होते हुए. शाब्दिक विवरणों से ज्यादा मनोविज्ञान को पढ़ते, पकड़ने और उसके चित्रण में रमती है। सोचकर देखें तो प्रेम, कर्तव्य और देशप्रेम एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू हैं और सबके मूल में प्रेम ही है. कर्तव्य भी तो प्रेम का ही एक रूप होता है और देशप्रेम भी तो बड़े और वृहद् अर्थों में प्रेम है इसलिए यह कहानी हर अर्थ में प्रेम कहानी है। कहानीकार ने अपनी कहानी का उद्देश्य अपनी विचारधारा के अनुसार रखा हैं। (कहानी का नाम) "उसने कहा था" उद्देश्य मात्र मनोरंजन या उपदेशात्मक देना नहीं अपितु आज के विविध सामाजिक परिस्थितियों, जीवन के प्रति विशेष दृष्टिकोण, समस्या का समाधान और जीवन मूल्यों का उद्घाटन करना रहा है। यहां उल्लेखनीय है कि यदि हम उद्देश्य के आधार पर कहानी का मूल्यांकन करते हैं तो वह विभिन्न घटनाओं में एकता स्थापित कर पाठक के मन पर अद्भुत प्रभाव डालती है, और कहानीकार का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है।

शीर्षक –
यह कहानी का न केवल प्राथमिक एवं महत्त्वपूर्ण उपकरण है अपितु कहानी का दर्पण भी है। कहानी अच्छी है अथवा बुरी, इसका बहुत-कुछ अंकन शीर्षक पर भी निर्भर है।

(कहानी का नाम) "उसने कहा था" प्रेम, शौर्य और बलिदान की अद्भुत प्रेम-कथा है। प्रथम विश्व युद्ध के समय में लिखी गयी यह प्रेम कथा कई मायनों में अप्रतिम है। प्रथम-दृष्टि-प्रेम तथा साहचर्य जन्य प्रेम दोनों का ही इस प्रेमोदय में सहकार है। बालापन की यह प्रीति इतना अगाध विश्वास लिए है कि 25 वर्षों के अंतराल के पश्चात भी प्रेमिका को यह विश्वास है कि यदि वह अपने उस प्रेमी से, जिसने बचपन में कई बार अपने प्राणों को संकट में डाल कर उसकी जान बचायी है, यदि आंचल पसार कर कुछ मांगेगी तो वह मिलेगा अवश्य। और दूसरी ओर प्रेमी का "उसने कहा था" की पत रखने के लिए प्राण न्योछावर कर वचन निभाना उसके अद्भुत बलिदान और प्रेम पर सर्वस्व अर्पित करने की एक बेमिसाल कहानी है। "उसने कहा था” का कथा-नायक अंत तक किसी को नहीं बताना चाहता, स्वयं अपने अधिकारी, बॉस, सूबेदार को भी नहीं कि उसने कितनी बडी कुर्बानी सिर्फ "उसने कहा था" की वचन-रक्षा के लिए दी है, बस केवल इतना-भर कह कर इस दुनिया को छोडने के लिए तैयार है, सूबेदारनी होरां को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि जो "उसने कहा था वह मैंने कर दिया।" सूबेदार पूछते भी हैं कि 'उसने क्या कहा था' तो भी लहना सिंह का उत्तर यही है की को उसने कहा था मैंने कर दिया।इस कहानी का शीर्षक भाव अथवा अर्थ-सूचक तो है ही, साथ ही संक्षिप्त, कौतूहलजनक, व्यंजनापूर्ण, विषयानुकूल है तथा (कहानी का नाम) का शीर्षक लघु और रोचक है। कहानी की मूल संवेदना से समन्वित यह शीर्षक सर्वाधिक उचित एवं प्रासंगिक है।

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