कबीर

भक्ति कालीन ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि होने के कारण कबीर हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनकी रचनाओं का मुख्य संकलन 'बीजक' नाम से प्रसिद्ध है। रचना शैली की दृष्टि से कबीर की वाणी 'बीजक' को तीन भागों में बांटा गया है। साखी, सबद और रमैनी। साखी में दोहै सबद में पद और  रमैनी में चौपाइयां संकलित है। 
भारतीय संतो में कबीर का व्यक्तित्व सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली है। वे जन्मजात विद्रोही कवि हैं। मुसलमान परिवार में जन्म लेकर भी वे मुसलमान नहीं थे। हिंदू होकर भी वह हिंदू नहीं थे। वैष्णव होकर भी वे वैष्णव नहीं थे। योगी होकर भी वही योगी नहीं थे। उनका रुप अनोखा और न्यारा था। उनकी कविता हृदय से निकली है। भजन जीवन के गायक हैं। उनकी कविता में अनुभूति की तीव्रता है । 
कबीर मूर्ति पूजा पर विश्वास नहीं करते थे, अतः मंदिरों और मस्जिदों में पूजा करने की भावना को उन्होंने तिरस्कृत दृष्टि से देखा। वे पंडित नहीं उपदेशक थे। केवल कवि नहीं, मानवता के पोषक थे। 

समाजसुधारक पुरुष थे क्योंकि उन्होंने समाज के भीतरी और बाहरी दोनों पक्षों की बुराइयों को अपना निशाना बनाया और उन्हें दूर करने की कोशिश की। उन्होंने व्रत रोजा नमाज आदि विधि विधान के कारण हिंदू और मुसलमान दोनों को फटकारा। 
वे क्रांति पुरुष थे। खुद को खुदा का बंदा मानते थे। कबीर समाज सुधारक और कवि एक साथ थे, क्योंकि उनके समाज सुधार का हथियार उनकी कविता ही थी कबीर ने जीवन को बहुत पास से समझा और अपने अनुभव के आधार पर उसे परिभाषित किया। 

उनकी कविता में समाज में फैले अंधविश्वास ,जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिकता, मूर्ति पूजा, छुआछूत ,ढोंग ,आडंबर आदि का डटकर विरोध किया। जनता को मन की पवित्रता, सहज और सरल जीवन, ईश्वर का नाम स्मरण, गुरु की कृपा आदि का महत्व समझाते हैं। वे मानते हैं कि पंच इंद्रियों के निग्रह से ही वास्तविकता है। 

ईश्वर एक है। साथ ही उनका मानना है कि ईश्वर निराकार है। उसका कोई रंग रूप नहीं है ।वह सर्वव्यापी है ।और वह प्रेम से ही प्राप्त किया जा सकता है। गुरु की कृपा से ही हम सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर ईश्वर की प्राप्ति कर सकते हैं। मानव धर्म की स्थापना करना ही उनकी काव्य रचना का उद्देश्य था । 

उन उनके काव्य में एकेश्वरवाद सर्वेश्वर वाद अद्वैतवाद और रहस्यवाद की उत्कृष्ट व्यंजना मिलती हैकबीर के काव्य में हृदय की सत्यता और अनुभूति की प्रधानता है कबीर का काव्य सरल सहज ग्रहण करने योग्य है। उनका प्रतीक विधान दैनिक जीवन से संबंधित है । उनके सहारे कबीर कठिन से कठिन अनुभूतियों को बड़ी सरलता के साथ व्यक्त कर देते हैं ।इस प्रकार हैम देखते हैं कि प्रगतिशील विचारक के रूप में हमें देखने को मिलते हैं कबीर कवि के साथ-साथ उच्च कोटि के साधक थे सत्य के पूजत थे ज्ञान के अगले अन्वेषक थे


कबीर की भाषा साधुक्कड़ी भाषा है ।कबीर के कबीर की भाषा सीधी सपाट और सरल है उनके शब्दावली सरस शब्दावली हैंउनकी भाषा में सहजता सरलता और प्रभाव है ।क्योंकि वह घुमक्कड़ थे इसलिए उनकी भाषा में कई भाषाओं के शब्द मिलते हैं इसीलिए उनकी भाषा को साधुक्कड़ी भाषा कहा जाता है। उनकी भाषा प्रतीकात्मक है। वह प्रसाद और प्रेषणनीयता के गुण से संपन्न है। उनकी भाषा बोलचाल की शब्दावली का उदाहरण है ।
कबीर ने अलंकारों को प्रयासपूर्वक नहीं सजाया है, अभी अपितु रूपक अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, उत्प्रेक्षा अलंकारों की सृष्टि स्वतः ही और स्वाभाविक रूप से हो गई है। 
उनकी उलट वासियों का चमत्कार अद्भुत है। उसमें समर्पण और भक्ति भावना भरी हुई है। दोहा उनका प्रमुख छंद है। शैली मुक्तक है।

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