हरी दूब पर बर्फ जड़ी
चमके हीरे की घनी कनी
सुबह सवेरे मुंह अंधेरे
सजती संवरी बनी ठनी
दिशा प्रतीची गोद खंगाल
प्राची प्रत्यंचा बाण संवार
सूरज लिए दिवस उपहार
खड़ा हुआ बदली के द्वार
रग रग रंगत दौड़ गई
उजियारी भी खौल रही
अंधकार की बांध गठरिया
पवन तपन संग डोल रही
रजत किरण उड़ती आईं
उतरी, दमकी, मन को भाई
सात रंग की ओढ़ चुनरिया
धूप सुहागन मांग सजाई
झरता लकदक पारिजात
करता पूरी रात शृंगार
धरा चढ़ाती अर्घ्य सिंदूरी
महक उठा सारा संसार।
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